अध्याय 9 34 कुल श्लोक

राजविद्या राजगुह्य योग

सर्वश्रेष्ठ विद्या और परम गोपनीय ईश्वरीय ज्ञान

श्लोक 22 / 34 · राजविद्या राजगुह्य योग

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate | teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham

📖 सरल हिंदी अर्थ

जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य युक्त भक्तों के योगक्षेम (जो उनके पास नहीं है उसे देना और जो है उसकी रक्षा करना) का वहन मैं स्वयं करता हूँ।

🎯 आज के जीवन के लिए व्यावहारिक सीख

अपने हृदय में अटूट विश्वास रखें; जो आपके भले का है, वह आपको अवश्य मिलेगा।
असुरक्षा और अभाव के भय को त्यागकर अपने कर्तव्य और भक्ति में लीन रहें।
ईश्वर उन सभी की देखरेख करते हैं जो निष्कपट भाव से सत्य के मार्ग पर चलते हैं।
योगक्षेम का यह ईश्वरीय वचन हर संघर्ष में सबसे बड़ा आत्मबल देता है।