सभी 18 अध्याय
1. अर्जुन विषाद योग
47
2. सांख्य योग
72
3. कर्म योग
43
4. ज्ञान कर्म संन्यास योग
42
5. कर्म संन्यास योग
29
6. ध्यान योग (आत्मसंयम)
47
7. ज्ञान विज्ञान योग
30
8. अक्षर ब्रह्म योग
28
9. राजविद्या राजगुह्य योग
34
10. विभूति योग
42
11. विश्वरूप दर्शन योग
55
12. भक्ति योग
20
13. क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग
35
14. गुणत्रय विभाग योग
27
15. पुरुषोत्तम योग
20
16. दैवासुर सम्पद् विभाग योग
24
17. श्रद्धात्रय विभाग योग
28
18. मोक्ष संन्यास योग
78
अध्याय 3
43 कुल श्लोक
कर्म योग
कर्तव्य पालन और निःस्वार्थ कर्म का मार्ग
श्लोक चुनें (1 - 43):
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
yad yad ācharati śhreṣhṭhas tat tad evetaro janaḥ | sa yat pramāṇaṁ kurute lokas tad anuvartate
📖 सरल हिंदी अर्थ
श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, अन्य मनुष्य भी वैसा ही करते हैं। वे जो आदर्श स्थापित करते हैं, सारा समाज उसी का अनुसरण करता है।
🎯 आज के जीवन के लिए व्यावहारिक सीख
उपदेश और सलाह देने से कहीं अधिक शक्तिशाली आपका स्वयं का आचरण है।
आपकी मेहनत, अनुशासन और सच्चाई ही दूसरों के लिए वास्तविक मार्गदर्शन बनेगी।
परिवार हो या आपका कार्यस्थल, नेतृत्व हमेशा उत्कृष्ट कर्मों से स्थापित होता है।
स्वयं वैसा इंसान बनें जैसा आप इस दुनिया को देखना चाहते हैं।